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झारखंड

झारखंड में कम बारिश की आशंका, कृषि विभाग ने जारी की खरीफ एडवाइजरी।

सूखे के खतरे से निपटने के लिए किसानों को वैज्ञानिक खेती अपनाने की सलाह।

साहिबगंज। इस वर्ष खरीफ मौसम में झारखंड में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना जताई गई है। मौसम विभाग के आकलन के बाद राज्य में सूखे की आशंका बढ़ गई है। हालांकि कृषि विभाग और कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से अपील की है कि वे घबराएं नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीके और बेहतर प्रबंधन के साथ खेती की तैयारी करें, ताकि संभावित सुखाड़ के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सके।

कृषि विभाग की ओर से किसानों के लिए विस्तृत खरीफ एडवाइजरी जारी की गई है, जिसमें जल संरक्षण, फसल चयन, वैकल्पिक खेती और आय के अन्य स्रोतों पर विशेष जोर दिया गया है।

विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि मई और जून में जहां भी बारिश हो, वहां तुरंत खेतों की गहरी जुताई कर लें। खेतों की मेड़बंदी मजबूत करने को कहा गया है ताकि वर्षा का पानी खेत में ही सुरक्षित रहे और मिट्टी में नमी बनी रहे।

कृषि विभाग का कहना है कि जल संरक्षण की तकनीक अपनाकर सूखे की स्थिति में भी फसल को काफी हद तक बचाया जा सकता है।

एडवाइजरी में किसानों से कहा गया है कि वे पूरी तरह धान की खेती पर निर्भर न रहें। कम पानी और कम समय में तैयार होने वाली वैकल्पिक फसलों की खेती अपनाने की सलाह दी गई है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं, मक्का, उड़द, मूंग, कुल्थी, सोयाबीन, सरगुजा, रागी, अन्य मोटे अनाज विशेषज्ञों के अनुसार विविध फसलें अपनाने से नुकसान का जोखिम कम होगा।

ऊंची जमीन, मानसून में देरी होने पर धान की खेती कम करने की सलाह दी गई है। इसकी जगह उड़द, रागी और सोयाबीन जैसी फसलों की खेती करने को कहा गया है।मध्यम ऊंची जमीन (डोन-3) यहां 100 से 105 दिनों में तैयार होने वाली धान की सीधी बुवाई करने की सलाह दी गई है। सूखे की स्थिति में मेड़ एवं नाली पद्धति अपनाकर अरहर, मक्का, ज्वार और बाजरा लगाने को कहा गया है।मध्यम जमीन (डोन-2), यहां रोपाई के बजाय 120 दिन से कम अवधि वाली धान की सीधी बुवाई करने की सलाह दी गई है। नीची जमीन (डोन-1) इन क्षेत्रों में पानी अधिक समय तक टिकता है, इसलिए यहां 120 दिन से अधिक अवधि वाली धान की रोपाई उपयुक्त मानी गई है।

यदि 10 से 15 दिनों तक बारिश नहीं होती है, तो फसलों पर 2 प्रतिशत यूरिया और 1 प्रतिशत पोटाश का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। इससे पौधों को पोषण मिलेगा और सूखे के असर को कम करने में मदद मिलेगी।

कृषि विभाग ने जोखिम कम करने के लिए मिश्रित खेती पर जोर दिया है। किसानों को एक ही खेत में एक से अधिक फसलें लगाने की सलाह दी गई है। उदाहरण के तौर पर अरहर के साथ मक्का, बाजरा के साथ दालें, सोयाबीन के साथ मोटे अनाज, इससे उत्पादन में स्थिरता बनी रहती है और नुकसान की संभावना कम होती है।

सब्जियों की खेती करने वाले किसानों को पानी बचाने के लिए ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक अपनाने की सलाह दी गई है। इससे कम पानी में बेहतर उत्पादन संभव होगा।

कृषि विभाग ने किसानों को खेती के साथ-साथ वैकल्पिक आय के स्रोत अपनाने की भी सलाह दी है। इसके तहत मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री (मुर्गी पालन) जैसे व्यवसायों से जुड़ने को कहा गया है। साथ ही पशुओं के लिए चारा और पानी का अग्रिम प्रबंध करने की अपील की गई है।

सरकार किसानों तक सही बीज, तकनीक और वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। किसी भी प्रकार की तकनीकी सहायता के लिए किसान निम्नलिखित स्तरों पर संपर्क कर सकते हैं, जिला स्तर पर जिला कृषि पदाधिकारी (DAO), परियोजना निदेशक आत्मा, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK)।

प्रखंड स्तर पर, बी.ए.ओ., बी.टी.एम., ए.टी.एम.

पंचायत स्तर पर, जनसेवक, कृषक मित्र

इसके अलावा किसान घर बैठे कृषि संबंधी सलाह प्राप्त करने के लिए किसान कॉल सेंटर के टोल फ्री नंबर 1800-123-1136 पर मुफ्त कॉल कर सकते हैं।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान समय रहते वैज्ञानिक सलाह का पालन करें, जल संरक्षण को प्राथमिकता दें और वैकल्पिक खेती अपनाएं, तो कम बारिश की स्थिति में भी नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। खरीफ मौसम में सतर्कता और सही रणनीति ही किसानों के लिए सबसे बड़ा सहारा साबित होगी।

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