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झारखंड

विश्व आदिवासी दिवस पर साहिबगंज कॉलेज में गूंजा आदिवासी संस्कृति, अधिकार और सम्मान का संदेश।

“आदिवासी दाइयों का सम्मान – जीवन और कल्याण की रक्षा” रहा कार्यक्रम का मुख्य विषय, जल-जंगल-जमीन और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का लिया संकल्प।

साहिबगंज। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रविवार को साहिबगंज कॉलेज, साहिबगंज में विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. रणजीत कुमार सिंह ने की, जबकि एसडीएम अमर जॉन ऐंद मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस वर्ष कार्यक्रम का मुख्य विषय “आदिवासी दाइयों का सम्मान – जीवन और कल्याण की रक्षा” रहा।

कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान, प्रकृति संरक्षण, सामाजिक सहभागिता तथा समाज के विकास में आदिवासी समुदाय के महत्वपूर्ण योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेष रूप से ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य की देखभाल में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली आदिवासी दाइयों के पारंपरिक ज्ञान और सेवाओं को सम्मानपूर्वक याद किया गया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्य डॉ. रणजीत कुमार सिंह ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस केवल एक विशेष दिवस मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के अधिकारों, सम्मान, संस्कृति, परंपराओं और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय सदियों से जल, जंगल और जमीन के साथ गहरे और संतुलित संबंध के साथ जीवन जीता आया है। प्रकृति संरक्षण, जैव विविधता की रक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग से जुड़ी आदिवासी परंपराएं आज के समय में पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायक हैं।

प्राचार्य ने कहा कि आधुनिक विकास की अवधारणा में भी आदिवासी समाज के पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के प्रति उनके सम्मान को उचित स्थान मिलना चाहिए। आदिवासी संस्कृति केवल लोकगीत, नृत्य और परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, सामुदायिक सहयोग, सामाजिक समानता और जीवन के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण निहित है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी भाषाओं, लोक परंपराओं, लोककला और पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना और इन समृद्ध परंपराओं को आगे बढ़ाना आवश्यक है।

प्राचार्य डॉ. सिंह ने विशेष रूप से आदिवासी दाइयों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता के दौर में इन महिलाओं ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्राप्त पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से माताओं और नवजात शिशुओं की देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी दाइयों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान का सम्मान किया जाना चाहिए। साथ ही, आवश्यकता के अनुसार उनके अनुभवों और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना भी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य आदिवासी समाज के सशक्तीकरण के दो महत्वपूर्ण आधार हैं। आदिवासी विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के अधिक अवसर उपलब्ध कराना, उनकी भाषाओं एवं सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण करना तथा रोजगार और नेतृत्व के अवसर प्रदान करना समाज एवं सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।

प्राचार्य ने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे आदिवासी समाज की समृद्ध परंपराओं से सीख लें और पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। उन्होंने कहा कि आदिवासी संस्कृति का सम्मान भारत की विविधता, लोकतांत्रिक मूल्यों और हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है।

उन्होंने विद्यार्थियों से प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने, पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एसडीएम अमर जॉन आईन्द ने अपने संबोधन में आदिवासी समाज के अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय की विशिष्ट पहचान और परंपराओं को संरक्षित रखते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा में समान अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर अवसर मिलने से आदिवासी समाज के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण को गति मिलेगी।

एसडीएम ने कहा कि विकास के साथ-साथ आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समाज की पहचान और परंपराओं को संरक्षित रखते हुए नई पीढ़ी को आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।

कार्यक्रम में आदिवासी दाइयों के योगदान को सम्मानपूर्वक याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य की रक्षा में पारंपरिक ज्ञान रखने वाली महिलाओं की भूमिका को पहचानना और सम्मान देना आवश्यक है। उनके अनुभव और ज्ञान को समाज की महत्वपूर्ण विरासत के रूप में संरक्षित किए जाने की जरूरत है।

वक्ताओं ने कहा कि परंपरागत ज्ञान को सम्मान देते हुए वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वास्थ्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए, ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित हो सके।

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने आदिवासी समाज के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक समानता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने पर जोर दिया। कहा गया कि आदिवासी समुदाय की समृद्ध परंपराएं और पारंपरिक ज्ञान देश की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिन्हें संरक्षित करना सभी की जिम्मेदारी है।

इस अवसर पर डॉ. धुर्व ज्योति सिंह, प्रो. प्रिया सिंह, प्रो. अनु सुमन बड़ा, सोनू फ्रांसिस मुर्मू, अक्षय कुमार, सुभाष हांसदा, प्रीफेक्ट अमित हांसदा, नायक बाबू धन सोरेन सीनियर, मनोहर टुडू, विनोद टुडू, मोहन हेम्ब्रम, प्रेम चंद्र मोहाली, अनूप टुडू, प्रीफेक्ट सोनी मुर्मू, सचिव बाली बेटी सोरेन, सोना बेसरा एवं दीपिका हांसदा सहित महाविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी, विद्यार्थी और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, परंपरागत ज्ञान, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त किया गया। उपस्थित लोगों ने आदिवासी संस्कृति एवं परंपराओं के संरक्षण तथा इसके मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम का समापन आदिवासी समाज के सम्मान, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में निरंतर प्रयास करने तथा जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के संकल्प के साथ हुआ।

विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, अधिकार और योगदान को सम्मान देने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों, परंपराओं और प्रकृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण संदेश दे गया।

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