विकसित भारत–जी राम जी योजना के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर जिला स्तरीय कार्यशाला-सह-प्रशिक्षण आयोजित।
उपायुक्त मेघा भारद्वाज ने पंचायतों की समग्र विकास योजना पर दिया जोर, योजनाओं की पुनरावृत्ति रोककर स्थानीय जरूरतों के अनुरूप कार्य करने का निर्देश।

पाकुड़। विकसित भारत–रोजगार और आजीविका मिशन के लिए गारंटी (ग्रामीण) अर्थात ‘विकसित भारत–जी राम जी योजना’ के प्रभावी एवं सफल क्रियान्वयन को लेकर रविन्द्र भवन, पाकुड़ में जिला स्तरीय एक दिवसीय कार्यशाला-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य योजना के उद्देश्यों, प्रावधानों, कार्ययोजना तैयार करने तथा क्रियान्वयन की प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी संबंधित पदाधिकारियों एवं कर्मियों को उपलब्ध कराना था, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के पात्र परिवारों तक योजना का लाभ पारदर्शी, प्रभावी और समयबद्ध तरीके से पहुंचाया जा सके।
कार्यक्रम का शुभारंभ उपायुक्त मेघा भारद्वाज, उप विकास आयुक्त अरविन्द कुमार लाल, अपर समाहर्ता जेम्स सुरीन एवं सभी प्रखंड विकास पदाधिकारियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।

कार्यशाला के दौरान मास्टर ट्रेनर परियोजना पदाधिकारी मोतिउर रहमान, जेई सुजीत कुमार मंडल, डीआरपी अनंत मंडल एवं ऑपरेटर सनत कुमार मंडल ने योजना के विभिन्न प्रावधानों, उद्देश्यों, कार्ययोजना निर्माण की प्रक्रिया तथा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से संबंधित विस्तृत प्रशिक्षण दिया।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को स्थानीय आवश्यकताओं की पहचान, प्राथमिकता निर्धारण, विभिन्न योजनाओं के बीच अभिसरण तथा गुणवत्तापूर्ण एवं टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदुओं की जानकारी दी गई।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए उप विकास आयुक्त अरविन्द कुमार लाल ने कहा कि ग्राम स्तर पर योजनाओं का चयन करते समय स्थानीय जरूरतों और प्राथमिकताओं को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से जल संरक्षण एवं जल संचयन से जुड़ी योजनाओं को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि दूसरी प्राथमिकता आजीविका संवर्धन से जुड़ी योजनाओं की होनी चाहिए। इसके तहत आजीविका मिशन की गतिविधियों, कृषि, चारा उत्पादन, पशुपालन तथा महिलाओं एवं ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने वाली योजनाओं को बढ़ावा दिया जा सकता है।
उप विकास आयुक्त ने कहा कि स्थानीय संसाधनों एवं संभावनाओं के अनुरूप ऐसी योजनाओं का चयन किया जाए, जिससे ग्रामीण परिवारों को स्थायी और बेहतर आजीविका उपलब्ध हो सके।
उन्होंने तीसरी प्राथमिकता के रूप में ग्रामीण आधारभूत संरचना के विकास पर जोर देते हुए कहा कि आधारभूत संरचना से जुड़ी योजनाएं केवल निर्माण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि ऐसी उपयोगी और टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण होना चाहिए, जो जल संरक्षण एवं आजीविका संवर्धन को भी मजबूत करें।
उप विकास आयुक्त ने योजनाओं के निर्माण में अभिसरण (कन्वर्जेंस) पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि मनरेगा सहित अन्य योजनाओं, आजीविका मिशन, जल संरक्षण तथा स्वच्छ भारत मिशन के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी परियोजनाओं को आपस में जोड़कर बेहतर और टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि उपलब्ध संसाधनों का बेहतर समन्वय कर ऐसी योजनाएं तैयार की जाएं, जिनका लाभ लंबे समय तक ग्रामीण समुदाय को मिल सके।
उप विकास आयुक्त ने पंचायतों की अपनी आय (OSR—Own Source Revenue) बढ़ाने की दिशा में गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि पंचायतों को उपलब्ध संसाधनों और संभावित प्रदर्शन अनुदान को ध्यान में रखते हुए अपने आय के स्रोतों को मजबूत करना होगा, ताकि विकास कार्यों के लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों में वृद्धि हो सके।
उन्होंने संबंधित पदाधिकारियों एवं पंचायत प्रतिनिधियों से स्थानीय आवश्यकताओं पर आधारित टिकाऊ, गुणवत्तापूर्ण एवं परिणामदायी ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) तैयार करने को कहा।
उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि योजनाओं में जहां भी कमी दिखाई दे, वहां संबंधित विभागों के माध्यम से प्रस्ताव उपलब्ध कराया जाए, ताकि आवश्यकता के अनुसार उचित निर्णय लिया जा सके।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए उपायुक्त मेघा भारद्वाज ने कहा कि ग्राम पंचायत विकास योजना तैयार करते समय केवल योजनाओं की संख्या बढ़ाने के बजाय गुणवत्तापूर्ण, उपयोगी एवं टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पंचायतों में अक्सर सीमित प्रकार की योजनाओं को बार-बार दोहराया जाता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में कई छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कार्य हैं, जिन्हें योजनाओं में शामिल कर पूरा किया जा सकता है।
उपायुक्त ने सार्वजनिक परिसरों की साफ-सफाई, झाड़ियों की सफाई, छोटे जलस्रोतों एवं जल संरचनाओं का जीर्णोद्धार तथा सार्वजनिक स्थलों के रखरखाव जैसे कार्यों को भी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप योजना में शामिल करने पर जोर दिया।
उपायुक्त ने कहा कि योजनाओं के निर्माण में बेहतर योजना-निर्माण और प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। पंचायतों में एक ही प्रकार की योजनाओं की पुनरावृत्ति से बचना होगा।
उन्होंने कहा कि एक ही सड़क अथवा एक ही प्रकार के कार्य को अलग-अलग योजनाओं एवं मदों से कराने के बजाय पंचायत की समग्र आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए समेकित कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए।
उपायुक्त ने पंचायत को एक इकाई मानकर उसके समग्र विकास की कार्ययोजना तैयार करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यदि किसी पंचायत में पर्यटन की संभावनाएं हैं तो वहां पहले समग्र आवश्यकताओं का आकलन किया जाए। इसके बाद सड़क, आंगनबाड़ी, विद्यालय, नाली, पेयजल सहित अन्य आवश्यकताओं को चिह्नित कर विभिन्न योजनाओं एवं विभागीय संसाधनों के माध्यम से उनका अभिसरण किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि बड़ी लागत वाली योजनाओं को उपयुक्त मद अथवा जिला स्तरीय योजना से तथा छोटे कार्यों को पंचायत स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से पूरा किया जा सकता है। इससे योजनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के साथ-साथ उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम एवं प्रभावी उपयोग सुनिश्चित होगा।

उपायुक्त मेघा भारद्वाज ने कहा कि कई पंचायतों में पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद अपेक्षित विकास परिणाम दिखाई नहीं देते। इसका एक प्रमुख कारण समुचित योजना निर्माण एवं प्राथमिकता निर्धारण का अभाव है।
उन्होंने कहा कि वित्तीय वर्ष शुरू होने से पहले ही पंचायतों को अपनी आवश्यकताओं, प्राथमिकताओं एवं उपलब्ध संसाधनों का विस्तृत आकलन कर योजनाओं की तैयारी करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि देश की कई पंचायतों ने सीमित संसाधनों के बावजूद उत्कृष्ट कार्य किए हैं। ऐसी सफल पंचायतों के मॉडल से सीख लेते हुए स्थानीय परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप बेहतर योजनाएं तैयार की जा सकती हैं।
उपायुक्त ने पंचायत प्रतिनिधियों एवं कर्मियों से उपलब्ध निधि का समुचित विश्लेषण करने तथा यह आकलन करने की अपील की कि अब तक किए गए कार्यों से ग्रामीण समुदाय को कितना स्थायी एवं प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हुआ है।
उपायुक्त ने कहा कि कार्यशाला में प्राप्त जानकारी और योजना निर्माण की समझ को मुखिया एवं पंचायत प्रतिनिधियों तक प्रभावी रूप से पहुंचाना आवश्यक है।
उन्होंने संबंधित पदाधिकारियों को पंचायत स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर जनप्रतिनिधियों को गुणवत्तापूर्ण एवं समेकित GPDP तैयार करने की प्रक्रिया से अवगत कराने का निर्देश दिया।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘प्लानिंग पहले, क्रियान्वयन बाद में’ की सोच के साथ कार्य किया जाए। पंचायत की आवश्यकताओं, उपलब्ध संसाधनों और विभिन्न योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करते हुए ऐसी GPDP तैयार की जाए, जिसका प्रभाव धरातल पर स्पष्ट दिखाई दे और जो पंचायत को सशक्त, स्वावलंबी एवं विकसित ग्राम पंचायत बनाने में सहायक हो।

उपायुक्त ने पंचायत स्तर पर आयोजित होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि आवश्यकता के अनुसार वे स्वयं भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल होकर पंचायत प्रतिनिधियों एवं संबंधित कर्मियों को मार्गदर्शन प्रदान करेंगी।
उन्होंने कहा कि बेहतर योजना-निर्माण, संसाधनों का समुचित उपयोग, योजनाओं का अभिसरण और गुणवत्तापूर्ण परिसंपत्तियों का निर्माण ही पंचायतों के समग्र एवं स्थायी विकास का आधार है।
कार्यशाला के माध्यम से अधिकारियों एवं कर्मियों को योजना के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में आवश्यक मार्गदर्शन दिया गया, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों को स्थानीय जरूरतों से जोड़ते हुए अधिक प्रभावी, पारदर्शी और परिणामदायी बनाया जा सके।




