‘आदिवासी महाजुटान’ को लेकर संत कुमार घोष का तीखा विरोध, कहा—भावनात्मक राजनीति नहीं, तथ्य और संविधान के आधार पर हो संवाद।
डीलिस्टिंग, धर्मांतरण, एफसीआरए और परिसीमन जैसे संवेदनशील विषयों पर भ्रम फैलाने से बचने की अपील; आदिवासी समाज के वास्तविक मुद्दों पर गंभीर चर्चा की मांग।

साहिबगंज। राजधानी रांची के मोराबादी मैदान में आयोजित ‘आदिवासी महाजुटान’ को लेकर राजनीतिक एवं सामाजिक बयानबाजी तेज हो गई है। आयोजन को लेकर हिंदू धर्म रक्षा मंच के केंद्रीय अध्यक्ष एवं अधिवक्ता संत कुमार घोष ने कड़ा एतराज जताते हुए आरोप लगाया है कि आदिवासी समाज के नाम पर विभिन्न महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मुद्दों को उठाकर लोगों को गुमराह करने का प्रयास किया जा रहा है।
संत कुमार घोष ने कहा कि डीलिस्टिंग, धर्मांतरण, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विषयों को लेकर आदिवासी समाज के बीच भ्रम अथवा भय का वातावरण नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक विषय पर चर्चा का अधिकार सभी को है, लेकिन अधूरी अथवा भ्रामक जानकारी के माध्यम से समाज को राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत करना उचित नहीं है।
संत कुमार घोष ने आरोप लगाया कि आदिवासी समाज को अलग-अलग वर्गों में बांटकर राजनीतिक लाभ लेने की प्रवृत्ति लंबे समय से देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के वास्तविक मुद्दे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि की सुरक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण हैं। इन विषयों पर केवल राजनीतिक बयानबाजी के बजाय गंभीरता से विचार और ठोस पहल की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के विकास को केवल राजनीतिक आंदोलनों अथवा चुनावी गतिविधियों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और विकास के क्षेत्र में दीर्घकालिक योजनाएं तैयार कर समाज को सशक्त बनाने की दिशा में ठोस कार्य होना चाहिए।
परिसीमन के मुद्दे पर संत कुमार घोष ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक विषय है, जिसका सीधा संबंध संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व से है। ऐसे विषयों पर जनता के बीच गलतफहमी पैदा करने के बजाय संवैधानिक प्रावधानों और प्रमाणित तथ्यों के आधार पर स्पष्ट एवं गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि संवेदनशील विषयों को लेकर समाज में भावनात्मक वातावरण बनाने के बजाय जनता तक सही और प्रमाणित जानकारी पहुंचाना आवश्यक है, ताकि लोग तथ्यों के आधार पर अपनी राय बना सकें।
संथाल परगना की स्थिति का उल्लेख करते हुए संत कुमार घोष ने कहा कि क्षेत्र में आदिवासी समाज के सामने भूमि, रोजगार, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और महिलाओं की सुरक्षा सहित अनेक गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। इन समस्याओं पर केवल बयानबाजी करने के बजाय गंभीर विमर्श और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को केवल चुनाव अथवा आंदोलनों के समय याद करने के बजाय उसे शिक्षा, रोजगार और विकास के अवसरों से जोड़ने के लिए दीर्घकालिक प्रयास किए जाने चाहिए।
संत कुमार घोष ने कहा कि प्रकृति-पूजक एवं पारंपरिक आदिवासी समाज की सदियों पुरानी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक पहचान का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब उसकी सांस्कृतिक जड़ों को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक शिक्षा, रोजगार और विकास के अवसर भी सुनिश्चित किए जाएं।
उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म रक्षा मंच आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक सम्मान, सांस्कृतिक संरक्षण और विकास से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी आवाज उठाता रहेगा।
अंत में संत कुमार घोष ने कहा कि आदिवासी समाज को किसी भी राजनीतिक अथवा वैचारिक स्वार्थ के लिए गुमराह नहीं किया जाना चाहिए। डीलिस्टिंग, धर्मांतरण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भावनात्मक राजनीति के बजाय तथ्य, संविधान और समाजहित के आधार पर खुला, निष्पक्ष एवं सार्थक संवाद होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के हित में होने वाली किसी भी चर्चा का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि उसके अधिकारों, सम्मान, विकास और भविष्य को मजबूत करना होना चाहिए।




