राजकीय माघी पूर्णिमा मेला राजमहल 2026: गंगा तट पर सजेगा झारखंड का ‘आदिवासी महाकुंभ’।
31 जनवरी से 6 फरवरी तक आस्था, संस्कृति और जनजातीय परंपराओं का विराट संगम।श्रद्धालु, कलाकार और समुदायों की भव्य सहभागिता।

राजमहल साहिबगंज।ऐतिहासिक और आध्यात्मिक नगरी राजमहल एक बार फिर आस्था, संस्कृति और जनजातीय गौरव के अद्भुत संगम है। राजकीय माघी पूर्णिमा मेला 2026 इस वर्ष 31 जनवरी से 6 फरवरी तक गंगा के पावन तट पर पारंपरिक गरिमा, उल्लास और भव्यता के साथ आयोजित किया जाएगा। यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की जनजातीय विरासत, लोकसंस्कृति और सामाजिक एकता का जीवंत उत्सव है। इसी कारण पूरे क्षेत्र में इसे श्रद्धापूर्वक “आदिवासी महाकुंभ” कहा जाता है।
माघी पूर्णिमा के अवसर पर दूर दराज़ से श्रद्धालु राजमहल पहुंचकर गंगा स्नान, पूजा-अर्चना और मेले में सहभागिता करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस पावन दिन गंगा स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। मेला अवधि में प्रतिदिन प्रातःकाल से ही गंगा घाटों पर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं, जबकि पूर्णिमा के दिन विशेष स्नान और पूजा का अत्यधिक महत्व होता है।
इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता है पहाड़िया, संथाल, मुंडा, उरांव सहित विभिन्न जनजातीय समुदायों की सक्रिय और गौरवपूर्ण भागीदारी। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकार अपने लोकनृत्य, लोकगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से पूरे वातावरण को जीवंत कर देते हैं। ढोल-मांदर की थाप, पारंपरिक गीतों की स्वर-लहरियाँ और सामूहिक नृत्य झारखंड की मूल आत्मा का सजीव अनुभव कराते हैं। यह मेला झारखंड की आदिम संस्कृति को निकट से देखने और समझने का दुर्लभ अवसर प्रदान करता है।
मेला को सफल, सुरक्षित और सुव्यवस्थित बनाने के लिए जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन और विभिन्न विभागों द्वारा व्यापक तैयारियाँ की गई हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु निम्न व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की गई हैं सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम स्वच्छता और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था स्वास्थ्य शिविर और प्राथमिक उपचार केंद्र प्रकाश व्यवस्था और अस्थायी शौचालय खोया-पाया केंद्र,पार्किंग और यातायात नियंत्रण की समुचित योजना इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य है कि श्रद्धालुओं और आगंतुकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
मेला अवधि में स्थानीय दुकानदारों, हस्तशिल्प कारीगरों, ग्रामीण उत्पाद विक्रेताओं और छोटे व्यापारियों को अच्छा बाजार मिलता है। हस्तनिर्मित वस्तुएँ, पारंपरिक खाद्य पदार्थ, जनजातीय हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पाद मेले का प्रमुख आकर्षण होते हैं। यह आयोजन स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का भी माध्यम बनता है।
राजकीय माघी पूर्णिमा मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक संरक्षण और जनजातीय अस्मिता का प्रतीक है। यहाँ हर वर्ग, हर समुदाय के लोग एक साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं। यह मेला झारखंड की पहचान, परंपरा और सांस्कृतिक गौरव का जीवंत उत्सव है।
31 जनवरी से 6 फरवरी तक गंगा तट पर लगने वाला यह राजकीय मेला हर वर्ष लाखों लोगों को आकर्षित करता है। राजमहल की पहचान बन चुका यह आयोजन आस्था, संस्कृति, परंपरा और एकता का महापर्व है।



